बाज़ार
विकास की स्टीयरिंग सरकार के हाथ में हो या प्रतिस्पर्धा के? यह पैमाना नापता है कि अर्थव्यवस्था की दिशा — मालिकाना, दाम, व्यापार, नौकरी — पर आपका भरोसा किस पर है।
राज्य-संचालित विकास
इस छोर का मतलब
अहम सेक्टर सरकारी हाथों में रहें, किसान को दाम की गारंटी मिले, और भारतीय उद्योग को बढ़ने तक सुरक्षा। बाज़ार देश की योजना के लिए है, उल्टा नहीं।
क्विज़ से लिए गए पक्ष
- सरकारी मालिकाना बढ़े — अहम सेक्टर कभी प्राइवेट न हों
- बड़ी फ़सलों पर क़ानूनी MSP गारंटी, सरकारी ख़रीद के साथ
- टैरिफ़ बढ़ें ताकि लोग भारतीय सामान ख़रीदें — हर बड़ा औद्योगिक देश ऐसे ही बढ़ा
- बड़ी फ़ैक्टरियों में छँटनी से पहले सरकारी इजाज़त बनी रहे
बाज़ार-संचालित विकास
इस छोर का मतलब
कमेटियों से बेहतर प्रतिस्पर्धा बनाती है। PSU बेचो, सेक्टर खोलो, दाम बाज़ार तय करे और कंपनियाँ खुद को बदल सकें। सरकार का काम नियम बनाना है, धंधा चलाना नहीं।
क्विज़ से लिए गए पक्ष
- सरकार धंधे से पूरी तरह निकले — बैंक और रेलवे समेत
- MSP धीरे-धीरे हटे; दाम की गारंटी खेती को बिगाड़ती है
- क़रीब-क़रीब मुक्त व्यापार और पूरी विदेशी प्रतिस्पर्धा की ओर बढ़ें
- छँटनी की सरकारी इजाज़त ख़त्म; उसकी जगह सख़्त मुआवज़ा नियम
बीच में होने का मतलब
शून्य के आस-पास का मतलब: सेक्टर देखकर फ़ैसला — बड़े PSU रहें, घाटे वाले बिकें, दरवाज़े सोच-समझकर खुलें।
यहाँ लोग अक्सर ग़लत समझते हैं
यह कल्याण वाला पैमाना नहीं है। भारत का सबसे आम प्रोफ़ाइल कल्याण भी चाहता है और प्राइवेट ग्रोथ भी — ये दो अलग पैमाने इसीलिए हैं।



