कल्याण
सरकार किसकी मदद करे, और कितनी? यह पैमाना सुरक्षा-जाल की चौड़ाई नापता है — सबके लिए हक़ से लेकर सिर्फ़ ज़रूरतमंदों तक।
व्यापक सरकारी सहायता
इस छोर का मतलब
सरकार खुलकर दे, और हक़ के तौर पर दे। 80 करोड़ लोगों को राशन चाहिए तो बिना जाँच-पड़ताल के मिले। पैसा उनसे आए जिनके पास सबसे ज़्यादा है।
क्विज़ से लिए गए पक्ष
- मुफ़्त राशन सबका हक़ बने — कोई भी परिवार ले सके
- सबके लिए सरकारी अस्पताल, इलाज मुफ़्त — ज़रूरत पड़े तो टैक्स बढ़े
- बहुत अमीरों पर संपत्ति और विरासत टैक्स लगे
- मनरेगा बढ़े, और शहरों में भी रोज़गार गारंटी आए
सीमित/लक्षित सहायता
इस छोर का मतलब
मदद सच में गरीब तक पहुँचे और वहीं रुके। हर किसी को बाँटने वाली स्कीमें बजट बिगाड़ती हैं और ग्रोथ रोकती हैं — और गरीबी ग्रोथ से जाती है। बाकी पैसा वहाँ लगे जहाँ नौकरियाँ बनती हैं।
क्विज़ से लिए गए पक्ष
- मुफ़्त राशन की जगह सच में गरीबों के लिए एक सीधी नकद मदद
- सरकारी इलाज सिर्फ़ सबसे गरीबों के लिए; बाकी अपनी जेब या बीमे से
- ऊपर के टैक्स रेट घटें — गरीबी बँटवारे से नहीं, ग्रोथ से जाती है
- मनरेगा धीरे-धीरे बंद हो; पैसा सड़क-बिजली और स्किल में लगे
बीच में होने का मतलब
शून्य के आस-पास होने का मतलब: आज वाला मेल ठीक लगता है — बड़ी स्कीमें भी, कुछ लक्ष्य और कुछ लगाम भी।
यहाँ लोग अक्सर ग़लत समझते हैं
यह पैमाना “गरीबों की परवाह कौन करता है” नहीं नापता — दोनों छोर यही दावा करते हैं। फ़र्क़ तरीक़े का है: हक़ बनाकर देना, या लक्ष्य साधकर देना और ग्रोथ पर भरोसा।



